लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने का सरकारी प्रस्ताव : पिछड़े वर्ग को फिर निराशा, कोई आरक्षण या सुरक्षा की गारंटी नहीं
प्रस्ताव और सरकार का उद्देश्य
नई दिल्ली।
केंद्र सरकार ने लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का औपचारिक प्रस्ताव रख दिया है। संविधान विधेयक 2026 के तहत 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए प्रस्तावित हैं। यह कदम 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने और 2011 की जनगणना के आधार पर सीमा पुनर्निर्धारण (डीलिमिटेशन) को आसान बनाने के लिए उठाया गया है। लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस बढ़ोतरी में दलित, अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी, महिलाएं और मुस्लिम समुदाय को कोई अतिरिक्त सुरक्षा या आरक्षण की गारंटी नहीं दी गई है।
अपराध और प्रतिनिधित्व की वास्तविकता
सरकार का दावा है कि बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है। लेकिन वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो सच्चाई अलग है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देश में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 2023-24 में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे मामले हजारों में दर्ज हुए। एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि दर 30 प्रतिशत से भी कम है। फिर भी नए प्रस्ताव में इन समुदायों के लिए अतिरिक्त सीटें या आरक्षण अनुपात बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है।
महिला, ओबीसी और मुस्लिम प्रतिनिधित्व
महिलाओं की बात करें तो वर्तमान लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या महज 14-15 प्रतिशत के आसपास है। महिला आरक्षण कानून 2023 में पारित हो चुका है लेकिन डेलिमिटेशन के बिना लागू नहीं हो सका। अब 850 सीटों के साथ भी यह आरक्षण लागू होगा या नहीं, इसकी कोई स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई। ओबीसी समुदाय के लिए लोकसभा में कोई आरक्षण नहीं है। मुस्लिम समुदाय की स्थिति और खराब है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 543 सांसदों में मुस्लिम सांसद सिर्फ 24 (4.4 प्रतिशत) रह गए जबकि उनकी आबादी 14.2 प्रतिशत है। प्रस्तावित 850 सीटों में भी उनके लिए कोई अलग सुरक्षा या न्यूनतम प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं रखा गया।
सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
दलित और पिछड़े वर्गों के संगठन कह रहे हैं कि मूर्तियां लगाने या प्रतीकात्मक सम्मान देने से काम नहीं चलेगा। अम्बेडकर के संवैधानिक सपनों को जमीन पर उतारने के लिए आरक्षण का सही क्रियान्वयन, भूमि वितरण और जाति उन्मूलन जरूरी है। लेकिन प्रस्ताव में इन मुद्दों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।
आर्थिक बोझ और विपक्ष का आरोप
प्रत्येक सांसद पर सालाना खर्च (वेतन, भत्ता, स्टाफ, यात्रा, निर्वाचन क्षेत्र निधि समेत) औसतन कई करोड़ रुपये है। कुल मिलाकर यह बढ़ोतरी करदाताओं पर नया बोझ बढ़ाएगी। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार प्रतीकात्मक विस्तार कर रही है लेकिन असली मुद्दे, सामाजिक न्याय, आरक्षण का सही अनुपात और अल्पसंख्यकों की भागीदारी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
आगे की प्रक्रिया और बड़ा सवाल
सरकार ने अभी विधेयक को सांसदों के बीच साझा किया है। 16 अप्रैल से शुरू होने वाले विशेष संसद सत्र में इसे पेश किया जाएगा। लेकिन सामाजिक न्याय के पैरोकारों का सवाल है, क्या 850 सीटों की बढ़ोतरी सिर्फ सत्ता के गणित को मजबूत करने के लिए है या वास्तव में कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने के लिए? फिलहाल प्रस्ताव दलित, एससी-एसटी, ओबीसी, महिलाओं और मुस्लिमों को फिर से निराश करने वाला साबित हो रहा है।